Ghazipur news: डीएम साहब: कागज़ों में रोज़गार, ज़मीन पर घोटाला! भांवरकोल में मनरेगा बना लूट का औज़ार, फर्जी हाजिरी–डिजिटल फोटो से उड़ाया जा रहा सरकारी धन

रिपोर्ट अभिषेक राय
गाजीपुर। प्रदेश सरकार भले ही मंचों से भ्रष्टाचार के खिलाफ “जीरो टॉलरेंस” की बात करती हो, लेकिन गाजीपुर जनपद का भांवरकोल विकासखंड इन दावों की जमीनी हकीकत को आईना दिखाता नजर आ रहा है। यहां महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा), जो गरीबों को रोजगार और गांवों को विकास देने के उद्देश्य से चलाई गई थी, अब कथित तौर पर फर्जी हाजिरी, डिजिटल फोटो और कागजी खानापूर्ति का शिकार बन चुकी है।
भांवरकोल क्षेत्र के कई गांवों में मनरेगा कार्यों की स्थिति बेहद चिंताजनक बताई जा रही है। धनेठा गांव में जिस नहर की सफाई के नाम पर लाखों रुपये खर्च दिखाए जा रहे हैं, वह नहर बीते करीब 20 वर्षों से सूखी पड़ी है। ग्रामीणों के अनुसार न तो उसमें पानी आता है और न ही किसानों को कोई लाभ मिलता है। बावजूद इसके, रिकॉर्ड में नहर की नियमित सफाई और मजदूरी भुगतान दर्शाया जा रहा है।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि मौके पर निरीक्षण के दौरान एक भी मजदूर कार्य करते हुए नहीं मिला, जबकि मस्टर रोल और NMMS (डिजिटल अटेंडेंस सिस्टम) में मजदूरों की पूरी उपस्थिति दर्ज है। यानी कागजों में काम भी पूरा और भुगतान भी पूरा, लेकिन जमीन पर सच्चाई शून्य।
वर्ष 2025 में NMMS के जरिए फर्जी फोटो अपलोड कर हाजिरी दर्ज करने की घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं। बेलसड़ी, पखनपुरा, शेरपुर, सोनाडी समेत कई गांवों में तो हालात और भी चौंकाने वाले हैं। जब पूरा प्रदेश कड़ाके की ठंड से जूझ रहा है, तब मनरेगा पोर्टल पर मजदूरों की ऐसी तस्वीरें अपलोड की जा रही हैं, जिनमें वे गर्मी के मौसम जैसे कपड़ों (हाफ पैंट, गंजी) में नजर आ रहे हैं। इससे सिस्टम की विश्वसनीयता और निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
मिर्जाबाद गांव में भी हालात अलग नहीं हैं। यहां प्रतिदिन लगभग 30 मस्टर रोल पर 280 से 290 मजदूरों की उपस्थिति दर्ज दिखाई जाती है, जबकि ग्रामीणों का दावा है कि यही मजदूर मनरेगा स्थल के बजाय निजी किसानों के खेतों में काम करते पाए गए। यानी सरकारी धन से निजी कार्य कराया जा रहा है।
ग्रामीणों का आरोप है कि इस तरह का बड़ा फर्जीवाड़ा बिना जिम्मेदार अधिकारियों की मिलीभगत या संरक्षण के संभव नहीं है। जब स्थानीय स्तर पर शिकायतें की गईं तो अधिकारियों की ओर से सिर्फ औपचारिक जवाब मिला—“मामले को दिखवाते हैं।” वहीं डीसी मनरेगा ने शिकायत मिलने पर कार्रवाई की बात कही, लेकिन अब तक कोई ठोस कदम सामने नहीं आया है।
ग्रामीणों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस पूरे प्रकरण को “दिनदहाड़े सरकारी लूट” करार देते हुए मांग की है कि पूरे भांवरकोल विकासखंड में मनरेगा कार्यों की स्वतंत्र और उच्चस्तरीय जांच कराई जाए, दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई हो और गबन की गई सरकारी धनराशि की वसूली सुनिश्चित की जाए।
भांवरकोल विकासखंड की यह स्थिति न केवल मनरेगा जैसी महत्वाकांक्षी योजना की साख पर सवाल खड़े करती है, बल्कि सरकार की जीरो टॉलरेंस नीति को भी खुली चुनौती देती नजर आ रही है। अब देखना यह होगा कि शासन-प्रशासन इस कथित फर्जीवाड़े पर कब तक चुप्पी साधे रहता है या वास्तव में दोषियों पर कार्रवाई कर जनता का भरोसा बहाल करता है।



